Sunday, July 4, 2010

अटलांटा का युवा हिन्दी शिविर संपन्न


डॉ. सुरेन्द्र गम्भीर
निदेशक युवा हिन्दी शिविर 2010


अटलांटा में हो रहे १०० युवा विद्यार्थियों का दस दिवसीय युवा हिन्दी शिविर का समापन समारोह शिक्षार्थियों की गतिविधियों के साथ बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। रविवार को एक भारतीय मेल लगा जिसमें विभिन्न विक्रेताओं ने अपनी अस्थायी दुकानें लगाईं और बच्चों ने वहां घूमकर चीज़ें खरीदीं। बेचने और ख़रीदने की प्रक्रिया हिन्दी में ही संपन्न हुई। जिस भाषा को सीखने का पिछले आठ दिनों से बड़े नियोजित ढंग से प्रयास चल रहा था उस भाषा को प्रयोग में लाने के लिए इस प्रकार का अवसर उपलब्ध कराया गया था। इस अवसर पर माता-पिता भी शामिल हए और उन्होंने भी वहां खाने पीने की और दूसरी चीज़ों के विक्रेताओं से हिन्दी में ही बातचीत की। बीस शिक्षक भी अपने बाज़ू पर “मदद” की पट्टी लगाए इधर उधर घूम रहे थे। अगर बच्चों को हिन्दी में बोलने के लिए बात न सूझ रही हो तो वे इनके पास जाकर पूछ सकते थे कि फ़लाँ बात हिन्दी में कैसे कहेंगे। यह सवाल भी हिन्दी में ही पूछना होता था जिसकी तैयारी उनको पहले से कराई गई थी।
प्रवासी संदर्भ में वर्षों से भारत से दूर रह रहे भारतीय मूल के लोगों का स्थानीय भाषा में अभ्यस्त हो जाना स्वाभाविक ही है। यह बात सत्य है कि पहली पीढ़ी के लोग अपनी भाषा भूलते नहीं हैं परंतु दूसरी पीढ़ी के बच्चों के मस्तिष्क और व्यवहार पर नए देश की स्थानीय भाषा शुरू से ही हावी हो जाती है। इसलिए अपनी पैतृक भाषा को बनाए रखने के लिए उन्हें विशेष प्रयास करना पड़ता है।
मेले के बाद बच्चों ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें नाटिकाएं, नृत्य, गीत और हिन्दी के टंग-ट्विस्टर्ज़ आदि प्रस्तुत किए गए। यह ठीक है कि इन प्रस्तुतियों के लिए तैयारी की गई थी परंतु इन प्रस्तुतियों के माध्यम से युवा शिक्षार्थियों का जो विश्वास बढ़ता है वह एक बात है और उनके मुंह में भाषा के थिरकने से भाषा बोलने की जो हिचक दूर होती है वह भाषा के अधिग्रहण की दृष्टि से बड़ा ही उपयोगी पक्ष है। उच्चारण को सुधारने में भी यह प्रक्रिया बड़ी उपयोगी सावित होती है। इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में मंच संचालन भी विद्यार्थियों ने ही किया। अधिक से अधिक विद्यार्थियों को इस प्रकार का अवसर देने के लिए हर प्रस्तुति के लिए अलग अलग विद्यार्थियों ने मंच पर आकर यह काम अपनी टूटी फूटी हिन्दी में बड़े विश्वास और साहस के साथ करके दिखाया। कुछ विद्यार्थियों ने केवल दो ही पंक्तियां बोलीं और कुछ ने कुछ अधिक वाक्यों में अपनी बात कही। प्रमाण पत्रों के वितरण के वाद युवा विद्यार्थियों को कहा गया कि अगर कुछ विद्यार्थी मंच पर आकर बोलना चाहें तो आकर बोलें। इस आह्वान को स्वीकार करते हुए लगभग दस विद्यार्थी बड़े उत्साह के साथ मंच पर भागते हुए आए और उन्होंने बड़े उत्साह के साथ दो चार वाक्य हिन्दी में बोले। वाक्यों में कुछ थे – ‘बहुत मज़ा आया’, ‘आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई’, ‘नमस्ते’, ‘धन्यवाद’, ‘आप कैसे हैं’ आदि। बच्चों के मुख से इस प्रकार स्वाभाविक हिन्दी निकलते देख प्रसन्न-वदन शिक्षक और शिक्षिकाएं देखते ही बनती थीं। माता-पिता तो शिक्षकों से भी ज़्यादा प्रसन्न थे। उनकी खुशी का ठिकाना न था। बाद में शिक्षकों ने अपनी कक्षा के छात्रों को एक एक करके गले लगाया और बड़े प्यार के साथ उनको विदा किया।
शिविर का वातावरण सांस्कृतिक गतिविधियों से भरपूर था और इन्हीं गतिविधियों में रमते रमते युवा छात्र हिन्दी के संदर्भ-सम्मत छोटे छोटे वाक्यों को सुनते, उनका उत्तर देते और उनका अभ्यास करते। उनका ध्यान भाषा पर न होकर उनके सामने उपस्थित कार्य पर होता। भाषा सीखने का यही उत्तम तरीका है। जब बच्चे घर के वातावरण में सीखते हैं तो वे भी ऐसे ही सीखते हैं। विदेशी भाषा के शिक्षण से संबंधित शोध-साहित्य में इसकी चर्चा कुछ इस प्रकार हुई है कि जब शिक्षार्थी का ध्यान शब्दों, वाक्यों और उनके व्याकरण पर नहीं होता परंतु उनके अर्थ पर होता है तब भाषा का ज्ञान अधिक स्थायी होता है। इसी पृष्ठभूमि में बच्चों ने कई प्रकार के पोस्टर बनाए, अपने अपने पासपोर्ट बनाए, तेल के दिये बनाए, टोपियां बनाईं और रगबिरंगे चित्र बनाए। ये सब कृतियां भारतीय प्रतिबिंबों से भरी थीं और उन पर उन्होंने हिन्दी के कुछ शब्द लिख कर उनकी विषयवस्तु को अभिव्यक्त किया। संस्कृति और भाषा के इस मिलन से भाषा की पैठ डनके मस्तिष्क में घर कर रही थी। दस दिन के इस कार्यक्रम में उन्होंने थोड़ी बहुत भाषा सीखी परंतु उससे ज़्यादा भाषा के प्रति उनकी सजगता और उनका आकर्षण और उसे आगे पढ़ने में उनकी रुचि निश्चित रूप से बढ़ी। माता पिता से जो प्रतिक्रियाएं हमें प्राप्त हुई हैं वे भी अत्यन्त उत्साहजनक थीं। कुछ का कहना था कि जब उनके बच्चे शाम को थके मांदे घर पहुंचते हैं तो हिन्दी के गीत गाते आते हैं और प्यार से मां को कहते हैं कि मां जल्दी करो बड़ी भूख लगी है। वे कहते हैं कि हम भारत से हैं इंडिया से नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे सुबह उठते ही शिविर जाने के लिए अपने आप तैयार होने लगते हैं। कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि आज मैं बहुत थका हूं और आज मैं शिविर नहीं जाऊंगा। बच्चों का यह स्वीकारात्मक व्यवहार हम सबका सबसे बड़ा प्रमाणपत्र बना।

No comments:

Post a Comment